आजकल हर कोई बहुत व्यस्त है—
इतना व्यस्त कि किसी के पास
सोचने का भी समय नहीं बचा…
हाँ, बोलने का समय सबके पास भरपूर है।
सोशल मीडिया पर ज्ञान
फ्री वाई-फाई की तरह बँट रहा है,
पर अफ़सोस…
कनेक्शन सबका है,
पर नेटवर्क समझ का नहीं मिलता।
हम बच्चों को भविष्य कहते हैं,
लेकिन उनकी बात सुनने का
वर्तमान हमारे पास नहीं है।
किताबें भारी लगती हैं,
मोबाइल हल्का—
शायद इसलिए विचार भी हल्के हो गए हैं।
हर व्यक्ति बदलाव चाहता है,
बस शर्त इतनी है कि
बदलाव दूसरा करे।
खुद तो हम वैसे ही परफेक्ट हैं—
कम से कम
व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के अनुसार।
देश, समाज और व्यवस्था पर
चर्चा चाय की प्याली तक सीमित है,
और समाधान
स्टेटस अपडेट में खत्म हो जाता है।
कहते हैं—
“बोलने की आज़ादी है”,
पर सुनने की आज़ादी
अब भी तलाश में है।
✒️ व्यंग्य यही नहीं कि हम हँसें,
व्यंग्य तब है जब हँसते-हँसते
खुद को पहचान लें।

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